Monday, 12 August 2019

पृथ्वी पर भयंकर साँपों का अस्तित्व

पृथ्वी पर साँपों की प्रजाति कब से है?

लगभग आज 6 करोड़ साल पहले , जब पृथ्वी से डायनासोर का अस्तित्व खत्म हुआ था. अब पृथ्वी पर ज्वालामुखी के लावे शांत होने जाने के बाद, गर्म मौसम में अब धरती पर रेंगने वाले जीवों को मौका मिला था , खुद का विकास करने का. पृथ्वी पर ज्यादा तापमान और ज्यादा ऑक्सीजन होने से, इन  जीवों की हड्डियाँ और मांसपेशियाँ बहुत तेजी से बढ़ने लगे थे, उसके बाद वो प्रजाति आई जिन्हें आज हम सांप कहते हैं. इस समय पृथ्वी का तापमान लगभग 80 डिग्री सेल्सियस रहा था. इतनी गर्मी में भी साँपों की प्रजातियाँ मज़े से जी रही थी. क्योंकि साँपों की खाल प्लास्टिक नुमा होती है , जो इन्हें ठंडी और गर्मी से बचाती है. और सभी तरह के मौसम में रहने लायक बना देती है. बेहद गर्म मौसम होने के कारण ये सांप आकार में बहुत बड़े हो रहे थे.  साल 2009 में कोलंबिया के सेर्रेजॉन गाँव में 1 कोयले की खान के अन्दर से, 1 बहुत ही बड़े आकार में हड्डियों का ढांचा मिला. जिसकी वैज्ञानिक जांच होने के बाद पता चला. की यह हड्डियों का ढांचा किसी डायनासोर का नहीं है. बल्कि ये हड्डियों का ढाचा 1 बहुत बड़े सांप का है. जिसको नाम दिया गया टाईटेनोबोआ. साँपों की यह प्रजाति आकार में सबसे बड़े और भयंकर होते थे.  इसकी लम्बाई लगभग 50 फिट, चौड़ाई 4 फिट, और वजन में ये 1500 kg से भी ज्यादा अनुमानित किया गया है.

सांप का 6 करोड़ साल पुराना हड्डियों का ढांचा




साँपों के वैज्ञानिक (हार्पिटोलौजिस्ट) द्वारा हड्डियों की जांच से पता चला की ये लगभग 6 करोड़ साल पुरानी है जिससे अब तो हमें इनके अस्तित्व होने के पक्के सबूत भी मिल गये है. इस प्रजाति के अन्दर जहर बिलकुल भी नहीं होता था. लेकिन इनके भयंकर आकार और भरपूर ताकत होने से कोई भी जीव इनसे बच नहीं पाता था, ये गहरे हरे और काले रंग के होते थे. इनके शरीर में कोई भी धारियां नहीं होती थी. बोयरिथिरियम और पैरिथिरियम नाम के जीव, इनके प्रीय भोजन होते थे.  जो हाथी के पूर्वज माने जाते हैं.  टाईटेनोबोआ के कंकाल मिलने से पहले तक, धरती के सबसे बड़े सांपो में जाईजैन्टोफिस को माना जाता था. जिसकी लम्बाई 33 फिट , चौड़ाई 2 फिट , वजन में ये 500 kg से ज्यादा होते थे. इनमे भी जहर नहीं होता लेकिन , इसके पास से कोई बच कर नहीं जा सकता था.  इन सांपो का अस्तित्व पिछले 6 करोड़ सालों से लगभग 4 करोड़ 80 लाख साल पहले तक रहा था. पृथ्वी का तापमान ठंडा होने के कारण इनका आकार छोटा होने लगा . जिससे सांपो की यह प्रजाति लुप्त हो कर छोटे कई अन्य प्रजातियों के साँपों में बदल गये. और आज भी हमारी धरती के गर्म स्थानों पर, बड़े आकार के सांप पाए जाते हैं. और अब तो वो बेहद जहरीले भी होते हैं.  

साँपों का इंसानी जीवन में अहम योगदान


इंसानी प्रजाति के विकसित होने में साँपों का सबसे बड़ा योगदान रहा है. ये सांप हमारे पूर्वज मैमेल्स का शिकार कर के खा जाते थे. जिनसे बचने के लिए हम मैमेल्स पेड़ों पर चढ़ने लगे थे. और साँपों से दूर रहने के लिए, उन पर अपनी पैनी नज़र रखने लगे थे. जिससे मैमेल्स का 45 % विकास बड़ी तेजी से हुआ. आज हमारी आँखों में तेज रोशनी है जो कैमरे के 576 मेगाफिक्सेल से भी ज्यादा है , ये सब साँपों की वजह से ही है. इसीलिए आज भी हम साँपों को देखते ही बेहद डर जाते हैं, जबकि ऐसा दुसरे किसी जीवों को देखकर नहीं लगता. अगर पृथ्वी पर सांप नहीं होते तो शायद हमारी नज़र इतनी तेज नहीं होती.

आज पृथ्वी पर साँपों की कुल प्रजातियाँ कितनी है

 आज पृथ्वी पर साँपों की कुल प्रजातियाँ 2500 से भी ज्यादा है,  जिनमे से 25% सांपो की जहरीली प्रजाति है. जो अपने अलग अलग आकार लिए धरती के हर कोने में मौजूद हैं. लेकिन ठंडे देशों में सांप नहीं पाए जाते है. या हम इनको गर्म वातारण वाले जीव कह सकते हैं.  इनकी उम्र साँपों की प्रजातियों के हिसाब से अलग 2 होती है. छोटे साँपों की उम्र 10 से 15 साल . और सबसे बड़े साँपों की उम्र 60 से 70 साल होती है. कुल साँपों की प्रजातियों में से 70% सांप ही अंडे देते है. बल्कि 30%  साँपों की प्रजातियाँ आपस में प्रजनन करके  बच्चे पैदा करते हैं. 

आज पृथ्वी पर सबसे बड़े सांप

आज के समय में सबसे बड़े साँपों की प्रजाति जिसका नाम पाइथन रेटिकुलेटस है. जिसकी लम्बाई 30 फिट से भी ज्यादा होती है. सांप अपने मुँह के निचले जबड़े को जमीन में रखकर ,आने वाले भूकंप की तरंगे महसूस कर सकता है. और इससे दूर जा कर बच सकता है. सांप कभी किसी मनुष्य को खुद से नुकशान नहीं पहुँचाता, बल्कि दुसरे द्वारा छेड़े जाने पर ही अपना पीछा छुड़ाने के लिए काट लेते हैं. साँपों के पैर नहीं होते. बल्कि सांप अपने निचले भाग के मांस पेशियों की मदद से चलते हैं .

साँपों के बारे में कुछ रोचक जानकारियां



सांप नाक से  नहीं सूंघते है बल्कि ये अपनी जीभ निकाल कर वातारण का एहसास करते हैं. साँपों की प्रजाति के पास कान भी नहीं होते है . ये लोगों की गलत फहमी है की बीन की आवाज सुनकर सांप आते हैं. इनकी आँखों में पलकें भी नहीं होती हैं, जिससे हमेशा इनकी आँखे खुली होती है. इनके मुँह में जहर की 1 थैली होती है जिनसे जुड़े होते है इनके दोनों पैने और खोखले दांत. जिनसे जहर निकल कर दुसरे के पास पहुचता है. धरती पर लगभग 525 प्रजातियों के जहरीले सांप रहते हैं. जिसमे सबसे ज्यादा जहरीले सांप जैसे -किंग कोबरा इसके 1 बार के काटने में हाथी को मारने जितना जहर निकलता है. यह अपना फन 4 फिट ऊपर तक उठा सकता है. , ब्लैक माम्बा 1 बार में 12 बार काट लेता है., रैटलस्नेक, डेथ एडर सबसे तेज हमला करने वाला सांप ,सॉ स्केल्डवाईपर , होर्न्ड वाईपर सिंग वाले सांप,  फिलिपिनी कोबरा, टाइगर स्नेक , ब्लू करैत , आदि पाए जाते हैं.  
सांपों की प्रजातीयां शीतरक्त की होती है. मतलब ठंडी होती है. इनके शरीर का तापमान मौसम के अनुसार बदलता रहता है.   सांपों के शरीर का तापमान भोजन के बिना ही घटता बढ़ता रहता है. इसलिए कम भोजन मिलने पर भी साँपों की प्रजातियाँ लम्बे समय तक जीवित रहते हैं . कुछ सांप महीने में एक बार भोजन करते हैं. जबकि कुछ बड़े साँपों की प्रजाति, साल में 1 या 2 बार ढेर सारा खाना खाकर जीवित रहते हैं. 

सांप खाते समय चबा नहीं पाते. बल्कि पूरा निगल जाते हैं जिससे इन्हें खाया हुआ पचाने में काफी समय लगता है. और साँपों के अन्दर जहर बनने की यही वजह होती है . अधिकतर सांपो के जबड़े , उनके मुँह से दुगने आकार में बड़े होते है.


सांप अपना मुँह 150 डिग्री से भी ज्यादा खोल सकता है. जिससे सांप बड़े जीवों को भी निगल जाता है. आज विश्व में सबसे लम्बे साँपों की प्रजाति में (जालीदार अजगर) रैटीकुलस पेथोंन का नाम दर्ज है. जो 30 फिट से ज्यादा लम्बा होता है. इसका वजन 120 kg से भी ज्यादा होता है. यह दक्षिण पूर्वी एशिया और फिलिपिन्स में पाए जाते हैं.



पृथ्वी के सबसे छोटे और अनोखे सांप




 विश्व के सबसे छोटे साँप थ्रेड स्नेक है, जो कैरिबियन सागर के महाद्वीपों में पाए जाते हैं इनका आकार सिर्फ 10 से 12 सेंटीमीटर ही होता है.  साँपों की कुछ प्रजातियाँ हवा में उड़ सकती है मतलब एक पेड़ से दुसरे पेड़ तक ,  50 से 100 फिट की उड़ान भर सकते हैं.
  
 समुद्र के अन्दर रहने वाले सापों की कुछ प्रजातीयां बेहद जहरीली होती हैं. जिनका 1 बूँद जहर लगभग 200 इंसानों को खत्म कर दे. साँपों की प्रजाति भी डायनासोर के समय में रहने वाले कुछ प्रजातियों में से ही 1 है.  सांप 1 साल में लगभग 3 बार अपनी पूरी चमड़ी निकाल देते हैं. सांप कुछ पीता नहीं है , बल्कि साँपों की जरुरत का पानी शिकार से मिल जाता है. लेकिन अगर सांप को भूखा रख कर कुछ पिलाया जाये तो सांप पि तो लेगा लेकिन उसे बाद में तकलीफ होती है. क्योंकि सांप दूध और पानी पचा नहीं पता है. इसलिए साँपों को कभी दूध नहीं पिलाना चाहिए. 

डायनासोर की प्रजातियों की उत्त्पति और अंत


डायनासोर का शुरुवाती अस्तित्व


डायनासोर पृथ्वी की सबसे भयंकर प्रजाति, जिसने मेसोजोइक युग के, पृथ्वी पर पिछले 25 करोड़ 20 लाख साल पहले, ट्राईएसिक काल में जन्म लिया था. और 6 करोड़ 60 लाख साल पहले, मेसोजोइक युग के क्रिटेसिअस काल में, इनका भयंकर अस्तिव खत्म हुआ था. डायनासोर शब्द को 1842 में सर रिचर्ड ओवेन ने बनाया था. उन्होंने ग्रीक शब्द से डीनोस लिया जिसका मतलब भयानक होता है. और सौरास शब्द लिया जिसका मतलब शक्तिशाली, चमत्कारिक होता है. लेकिन पृथ्वी पर आज भी, डायनासोरों के वंशज, हम सबके बीच ही रहते हैं. सिर्फ उनका आकार बदल गया है.


डायनासोर के अस्तित्व का समय

करोड़ों साल बाद अम्ल वर्षा का असर खत्म हुआ. पेड़ पौधे फिर से उगने लगे थे. और अब वक्त था डायनासोर का. जिसे हम मेजोज़ोइक युग के नाम जानते है. इसको 3 भागों में बाटा गया है.

                                                                                 · ट्राईएसिक युग
· जुरासिक युग
· क्रिटेसिअस युग



डायनासोर की नयी प्रजातियों की शुरुवात

मेजोज़ोइक युग की शुरुवात, आज से लगभग 25 करोड़ 20 लाख साल पहले हुयी थी. और इनका अंत आज से लगभग 6 करोड़ 60 लाख साल पहले हुआ था. इनका पृथ्वी पर अस्तित्व 18 करोड़ 60 लाख सालों तक रहा,जिसमे 25 करोड़ 20 लाख साल पहले ट्राईएसिक युग की शुरुवात हुयी. और इस युग को भी 3 भागों में बाटा गया है.
                                                                                    · अर्ली ट्राईएसिक
· मिडिल ट्राईएसिक
· लेट ट्राईएसिक
अर्ली ट्राईएसिक जिसकी समय सीमा लगभग 25 करोड़ 20 लाख साल से 24 करोड़ 70 लाख साल तक रही थी. जिसमे ट्राईरेनोसौर्स(Trirenosaurs), ओर्निथोमिमस(Ornithomimus), पेत्रोसौर्स(petrosaurs), लिस्ट्रोसौरस (lystrosaurus), लेबीरिनथोडोंत्स (labyrinthodonts), और
यूपर्केरिया(euparkeria), और टेम्नोस्पोंड्यली(temnospondyli) जैसे माँसाहारी जीवों का विकास हो रहा था.

डायनासोर के अस्तित्व का विकास क्रम

उसके बाद मिडिल ट्राईएसिक युग की शुरुवात हुयी. जिसकी समय सीमा 24 करोड़ 70 लाख सालों से 23 करोड़ 70 लाख सालों तक रही. इस समय पेंजिया द्वीप टूटना शुरू हो गया था. रेंगने वाले जीव आकार में काफी बड़े होने लगे थे. जिससे महासागरों में भी बड़े आकार में भयंकर जीव आ गये थे. जैसे इच्थ्योसौर्स(ichthyosaurs), नोथोसौर्स(nothosaurs), प्रोलीफेरेटेड(proliferated). और जमीनों पर पाइन नामक पेड़ों से जंगल गए थे. जिससे पहली बार मच्छर और कीड़े मकौड़े भी अस्तित्व आ चुके थे. और साथ ही मगरमच्छ अपना आकार बढ़ा रहे थे. और समुद्री जीवों से मुकाबला कर के उनको ही अपना भोजन बनाते थे.
अब लेट ट्राईएसिक युग शुरु हो चुका था. जिसकी शुरुवात 23 करोड़ 70 लाख साल पहले और अंत आज से लगभग 20 करोड़ 10 लाख साल पहले हुआ थी. इस युग में मगरमच्छ और भी भयंकर हो चुके थे. और भीमकाय डायनासोर भी आ चुके थे. साथ ही आसमान में उड़ने वाले पेत्रोसौर्स डायनासोर भी काफी संख्या में बढ़ रहे थे. तभी पृथ्वी ने फिर से ज्वालामुखी का कहर झेला जिसे 80% जीव नहीं झेल पाए और विलुप्त हो चले, प्राचीन मगरमच्छ समुद्र की गहराई में चले जाने से बच गए.

डायनासोर की जुरासिक काल की अवधि

जिसके बाद शुरू हुआ जुरासिक युग:- इस युग की शुरुवात पिछले 20 करोड़ 10 लाख साल पहले हुयी थी. और अंत 14 करोड़ 50 लाख साल पहले हुआ था. जुरासिक युग को भी 3 भागों में बाटा गया.
· अर्ली जुरासिक
· मिडिल जुरासिक
· लेट जुरासिक
अर्ली जुरासिक की अवधि पिछले 20 करोड़ 10 लाख साल पहले से 17 करोड़ 40 लाख साल तक थी. इस समय में कई नए समुद्री जीव आ गये थे. और जमीन पर डायनासौर्स, मगरमच्छ और कई दुसरे बड़े जीवों का कब्ज़ा था. जिसमे डिलोफोसौरस(dilophosaurus) सबसे आगे थे. मगरमच्छो का भी विकास जारी था. अब दुनिया के पहले मैमेल्स भी आ गये थे. जो आकार में छोटे चूहे जैसे दिखते थे.
मिडिल जुरासिक की समय अवधि पिछले 17 करोड़ 40 लाख साल से 16 करोड़ 30 लाख साल तक रहा. जिस वक्त डायनासौर्स की 1 हजार से भी ज्यादा प्रजातियाँ पृथ्वी पर आ चुकी थी. इसीवक्त विशाल डायनासौर ब्रचिओसौरस (Brachiosaurus) और डिप्लोडोकस (Diplodocus) दिखते थे जिनके सर पर सींग भी होती थी. दुसरे प्रजाति के बड़े डायनासोर्स अल्लोसौरस (allosaurus) भी आम तौर पर पाए जाते थे. कोनिफर नाम के जंगलों ने दुनिया को हरा भरा कर दिया था. वन्ही समुद्रों में भी प्लेसिओसौरस (plesiosaurs) और इच्थ्योसौरस (ichthyosaurs) नाम के जीवों का राज हो गया था.
लेट जुरासिक का समय पिछले 16 करोड़ 30 लाख साल से 14 करोड़ 50 लाख साल तक रहा था. इस समय में पेंजिया महाद्वीप टूट कर कई भागों में बट रहा था. इसका असर समुद्री जीवो पर पड़ा, जिससे इच्थ्योसौरस (ichthyosaurs) और प्लेसिओसौरस (plesiosaurs) ये बदलाव झेल नहीं पाए. और इनका अस्तित्व खत्म हो गया. उस वक्त के अधिकतर डायनासौर खत्म हो गये थे. पेंजिया के टूटने की वजह से नए तरह का महासागर बना. जिसे आज हम एटलांटिक महासागर कहते हैं.
अब शुरुवात हुयी क्रिटेसिअस युग की

डायनासोर का अंत समय , क्रिटेसिअस युग की शुरुवात

समय के साथ ही नए डायनासौर अस्तित्व में आये. अब क्रिटेसिअस युग की शुरुवात हुयी, जिसकी अवधि पिछले 14 करोड़ 50 लाख साल से 6 करोड़ 60 लाख सालों तक रहा था. क्रिटेसिअस युग मेजोजोइक युग का सबसे लम्बा युग था. इस युग को दो भागों में बाटा गया है.
· अर्ली क्रिटेसिअस युग
· लेट क्रिटेसिअस युग
अर्ली क्रिटेसिअस युग पिछले 14 करोड़ 50 लाख सालों से पिछले 10 करोड़ सालों तक रहा था. इस समय में कई तरह की प्रजातियों के डायनासौर पृथ्वी पर आये. जैसे कार्चारोदोंतोसौरस(Carcharodontosaurus), स्पाईनोसौरस (Spinosaurus) और समुद्रों में भी मोसासौरस (mosasaurs) पाए जाते थे. ये जीव जो आकार में डायनासौर जितने या उससे भी बड़े होते थे, सभी जीव अंडे देकर अपनी प्रजातियों को आगे बढ़ा रहे थे. आसमान में उड़ने वाले जीव जैसे टेपजारा(Tapejara) और ओर्निथोचीरस (Ornithocheirus) भी आकार में बड़े होने लगे थे. मौसम सभी जीवों के अनुकूल चल रहा था.
शुरुवात हुयी अब लेट क्रिटेसिअस युग की
जो लगभग पिछले 10 करोड़ साल से 6 करोड़ 60 लाख सालों तक रहा था. उस वक्त पृथ्वी का तापमान लगभग 20 डिग्री
सेल्सियस था. इस वक्त भी डायनासौर अपना विकास कर के अलग अलग प्रजातियों के रूप में जन्म ले रहे थे. जैसे हड्रोसौरस (Hadrosaurs), अन्किलोसौरस (Ankylosaurus), ट्राईसेरोटोप्स (Triceratops) और त्य्रांनोसौरस (Tyrannosaurus). ये ऐसे जीव थे. जो दुसरे जीवों को मारकर अपना भोजन बनाते थे. दूसरी तरफ एपेटोसौर्स, ब्रेकियोसौर्स ऐसे डायनासौर थे जो शाकाहारी थे. ये पेड़ पौधे ही खाते थे. गहरे समुद्र के अन्दर मोसासौरस (mosasaurs) ने इच्थ्योसौरस (ichthyosaurs) को मारकर उनकी जगह ले ली थी. और एल्स्मोसौरस (Elsmosaurus) जिनकी गर्दन जिराफ के जितनी लम्बी होती थी. वो भी समुद्रों में पाए जाने लगे थे. अब धरती पर फूलों वाले पेड़ भी उगने लगे थे. अब क्रिटेसिअस युग का अंत होने का समय आ गया था. धरती की सतह खिसकने लगी थी. और पेंजिया टूटकर अलग अलग महाद्वीपों में बटने लगे थे. जिससे ज्वालामुखी फटना शुरू हो गया था. और लावा के अन्दर मौजूद जहरीली गैसें सभी जीवों के अंत का कारण बन गयीं. ये सब हो ही रहा था. तभी आज से पिछले लगभग 6 करोड़ 60 लाख साल पहले आसमान से 1 (Astroid) गृह जो 70 हजार kmph की रफ़्तार से, पृथ्वी के मैक्सिको देश के पेनेन्सुला सिटी में जा गिरा. जिससे पृथ्वी पर से 75% आबादी का अंत हो गया. सभी डायनासौर का अस्तित्व इस क्रिटेसिअस युग के साथ खत्म हो गया था. बचे हुए 25 % डायनासोर और दुसरे जीव भूंख मिटाने के लिए एक दुसरे को मारकर खाने लगे जिससे . 1-1 करके सारे डायनासोरों का अस्तित्व खत्म हो गया.

क्या डायनासोर का अस्तित्व आज भी है ? तो इसका जवाब हाँ है.



डायनासोर का हिन्दी शब्द भीमसरट होता है. जिसका अर्थ भयानक छिपकली है. कुछ डायनासोर शाकाहारी पेड़ पौधे खाने वाले थे. तो कुछ मांसाहारी थे. कुछ डायनासोर 2 पैरों वाले थे. तो कुछ 4 पैरों वाले थे. डायनासोर अपने अंडे देने के लिए घोंसलों का निर्माण करते थे. और आज पक्षियों के समान अंडे देते थे. आज के पक्षियों को डायनासोर का ही वंशज माना जाता है. वैज्ञानिकों ने अब तक डायनासौर के 500 वंश और 1000 प्रजातियों की खोज की है.  आसमान में उड़ने वाली चिड़ियाँ, और दीवाल पर चलने वाली छिपकलियाँ , डायनासोर की 1000 प्रजातियों में से, बचे हुये कुछ वंशज ही हैं. जिन्हें हम और आप बड़ी आसानी से देख पाते हैं. अब वो भयंकर नहीं रहे, क्योंकि अब उनका आकार बेहद छोटा है.   जिनके अवशेष पृथ्वी के हर महाद्वीपों में पाए गए है. साल 1970 में मिले डायनासोर के कंकाल दुनिया भर के संग्राहलयों में आकर्षण का केंद्र बन गये है.

Saturday, 27 July 2019

पृथ्वी का जन्म, पृथ्वी पर इतना पानी कंहा से आया, पृथ्वी पर जीवन कैसे शुरू हुआ.

पृथ्बी का जन्म 

आज से लगभग पिछले 5 अरब साल पहले, सूर्य के जन्म के कारण हुए धमाके से, सूर्य की ग्रेविटी पॉवर की वजह से, निकला हुआ लावा और मलबा, सूर्य के चारों ओर घूमने लगा, और फिर ये आग का मलबा, आपस में इकठ्ठा हो कर, कई लाख साल तक ग्रेविटी पॉवर से, कई सारे छोटे बड़े गृह  बन गए, जिससे हमारा सौर मंडल बन गया. जिसमें से 1 हमारी पृथ्वी भी थी, उस वक्त पृथ्वी का तापमान 1200 डिग्री सेल्सियस था. धरती आग के बुलबुले जैसे थी. उस वक्त धरती पर सिर्फ उबलती हुयी चट्टानें, कार्बनडाईआक्साइड, नाईट्रोजन, और जलवाष्प थी. पृथ्वी की कोई भी सतह शख्त नहीं थी. साढ़े 4 साल पहले आसमान से 1 मंगल गृह के आकार का दूसरा गृह 1 लाख 80 हजार kmph की रफ्तार से पृथ्वी में जा टकराया, और पृथ्वी में पूरी तरह समाहित हो गया. जिससे बहुत बड़ा धमाका हुआ, इस धमाके से कई खरब टन मलबा, पृथ्वी से बाहर की ओर निकल गया, और पृथ्वी की ग्रैविटी पॉवर की वजह से, पृथ्वी का चक्कर लगाने लगे. और आपस में जुडकर 1 गेंद बन गयी, जिसे आज हम चाँद कहते हैं. चाँद उस वक्त पृथ्वी से मात्र 22000 km दूर था. जिससे चाँद की ग्रैविटी पॉवर पृथ्वी पर लगने से पृथ्वी के अन्दर का लावा ज्वालामुखी बन कर निकलने लगा. यह सिलसिला लाखों सालों तक चलता रहा. 



पृथ्वी पर इतना पानी कंहा से आया

लगभग 3 अरब 900 करोड़ साल पहले, आसमान में बची हुयी चट्टाने, उल्का पिंड धरती पर बरसना शुरू हो गए, जो लगातार दो अरब सालों तक पृथ्वी पर बरसे, पृथ्वी पर गिरने वाली उल्का पिंडों के अन्दर चमकदार क्रिस्टल थे, जिसे आज हम नमक कहते है. जो पृथ्वी पर गिरने के बाद पानी बन गए. आज हम जिन महासागरों के पानी से नमक बनाते है, ये पानी के महासागर भी, इन उल्का पिंडों के अन्दर मौजूद, नमक से ही बना है. इसीलिए सारे समुद्र का पानी नमकीन होता है. आज पृथ्वी में जो पानी है, वह कई अरबो साल पुराना है.
धरती पर ज्यादा पानी इकठ्ठा होने के कारण, पृथ्वी की उपरी सतह ठंडी और शक्त बन गयी. लेकिन धरती के अन्दर लावा अपना भयंकर रूप लिए मौजूद था . पृथ्वी का ऊपरी तापमान उस वक्त 80 डिग्री सेल्सियस हो चुका था.  तब चाँद पृथ्वी के बेहद करीब होने की वजह से, चाँद से निकलने वाली ग्रैविटी पॉवर ने, पृथ्वी पर तूफान मचा दिया, जिसने पूरी पृथ्वी पर उथल पुथल कर दिया. यह सिलसिला लाखों सालों तक चलता रहा. समय के साथ चाँद पृथ्वी से दूर चला गया. जिससे तूफान, पानी की लहरें शांत हो गयी.  अब पृथ्वी के अन्दर का लावा, फिर से ज्वालामुखी बनकर बाहर निकलने लगा. और छोटे छोटे द्वीप बनाने लगे. दूसरी तरफ उल्का पिंडों की आकाश से बारिश, अभी बंद नहीं हुयी थी.


पृथ्वी पर जीवन कैसे शुरू हुआ

लगभग 3.8 अरब साल पहले, आकाश से पृथ्वी पर गिरने वाली, उल्का पिंडों के अन्दर, पानी और नमक के अलावा और भी कुछ था, जिसमे जीवन पैदा करने वाले  तत्व मौजूद थे. इसके अन्दर कार्बन और एमिनो एसिड थे. जो पृथ्वी के हर जीवधारियों और पेड़- पौधों में मौजूद होते हैं. ये उल्का समुद्र के पानी में, 3 हजार किलोमीटर नीचे चले जाते थे. जंहा पर सूर्य की रोशनी नहीं पहुचती थी, जिससे उल्का पिंड ठंडे होकर जमने लगे. लेकिन इनके अन्दर गर्म लावा मौजूद था. इन्होने एक चिमनी का आकार बनाना शुरू कर दिया, और फिर इन चिमनियों के अन्दर पानी जाने से एक केमिकल रिएक्शन हुआ, जिससे शूक्ष्म जीवों का जन्म हुआ. और धीरे धीरे पूरे समुद्र के अन्दर सिंगल सेल बैक्टीरिया पैदा हो गये.  जो दिखने में पत्तों की तरह लगते थे. जिन्हें स्ट्रोमेटोलाइट भी कहा जाता है.

पृथ्वी पर इतनी ऑक्सिजन कंहा से आई

जिन उल्का पिंडों के अन्दर से, नमक पिघल कर पानी बना, वही पानी इकठ्ठा होकर समुद्र बना. आकाश से पृथ्वी पर गिरने वाली उल्का पिंडों के अन्दर, पानी और नमक के अलावा और कुछ भी था, जिसमे जीवन पैदा करने वाले तत्व मौजूद थे. इन तत्वों के समुद्र के पानी के साथ मिलने से, अब समुद्र के अन्दर चट्टानों की ऊपरी सतह पर, पत्तों की तरह दिखने वाले जीवित बैक्टीरिया पैदा होने लगे थे. और इन्होने पूरे समुद्र में कब्ज़ा कर लिया था. ये बैक्टीरिया सूर्य की रोशनी से अपना भोजन बनाते थे. इस प्रक्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं. जिसमे यह सूर्य की किरणों की ताकत से, कार्बन डाई आक्साइड और पानी को ग्लूकोस में बदल देता है. और काफी मात्रा में ऑक्सिजन छोड़ता है. जिससे समय के साथ सारे समुद्र ऑक्सिजन से भर गये. ऑक्सिजन के कारण पानी में मौजूद लोहे को जंग लगने लगी, जिससे लोहे के अस्तित्व का पता चला. लगभग 2 अरब सालों तक ऑक्सिजन पूरी पृथ्वी और आकाश में फैलती रही.
पृथ्वी का घूमने का समय भी कम होने लगा था. लगभग आज से 1.5 अरब साल पहले 1 दिन सिर्फ 16 घंटे के होने लगे थे. इसके कुछ लाखों साल बाद, महासागरों के नीचे दबे लावों ने, पृथ्वी की ऊपरी सतह को गतिमान कर दिया, जिसने धरती की सभी परतों को आपस में जोड़कर, 1 बहुत ही विशाल द्वीप बना दिया. जिसका नाम था रोडिनिया. दिन बढ़ कर 18 घंटे के होने लगे थे. उसके बाद पृथ्वी के गर्भ से एक ऐसी शक्ति ऊपर की ओर निकली, जिसने धरती को 2 बड़े टुकड़ों में बाँट दिया. यह शक्ति थी ताप , जो धरती के अन्दर पिघले हुए लावों से बनी थी. जिसने धरती की ऊपरी सतह को कमजोर कर के, दोनों सतह को एक दुसरे से काफी दूर कर दिया.
जिससे 2 महाद्वीप बनें. लारेशिया और गोंडवाना.

पृथ्वी पर बर्फ कैसे बनी :-

धरती पर ज्वालामुखी फटने का सिलसिला लगातार जारी था. ज्वालामुखी से निकले हुए लावा के साथ कार्बनडाईआक्साईड , और अन्य कई हानिकारक गैसें वातावरण में फैलने लगी. जिसने सूर्य से आने वाली किरणों को, सोखना शुरू कर दिया. जिससे धरती का तापमान बढ़ने लगा. इस बढ़ते तापमान के कारण, समुद्र के जल से बने बादल, और कार्बनडाईआक्साईड आपस में मिलकर, पृथ्वी पर अम्ल बारिश(Acid Rain) करने लगे. बारिश के साथ आने वाली कार्बनडाईआक्साईड को, चट्टानों और पत्थरों ने सोख लिया. वातावरण में कार्बनडाईआक्साईड खत्म हो जाने से, कुछ हजार सालों में धरती का ऊपरी तापमान, घट कर -50 डिग्री सेल्सियस हो गया. जिससे पृथ्वी बर्फ की गेंद जैसी बन गयी. धरती पर चारों तरफ बर्फ हो जाने से, सूर्य की किरणे पृथ्वी से रिफ्लेक्ट हो जाती थी. जिससे तापमान बढ़ नहीं पाता, और बर्फ जमती चली जा रही थी. लेकिन धरती के अन्दर लावा अभी भी जल रहा था, जिससे ज्वालामुखी तैयार हो रहे थे. और फट भी रहे थे. लेकिन बर्फ इतनी ज्यादा हो गयी थी. की ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे भी, बर्फ को पिघला नहीं पा रहे थे. तब लावों से कार्बनडाईआक्साईड निकल कर इकठ्ठा होने लगा , और सूर्य से मिलने वाली गर्मी को सोख कर, बर्फ को पिघलाने लगा. अब तक एक दिन 22 घंटो के होने लगे थे.

पृथ्वी पर ओजोन की परत कैसे बनी:-

बर्फ पिघलते समय, सूर्य से आने वाली पराबैगनी किरणों से, एक केमिकल रिएक्शन हुआ, जिससे पानी में हाइड्रोजन पराआक्साइड बनी. उसके टूटने से ऑक्सीजन बनी. यही ऑक्सीजन गैस आकाश में 50 किलोमीटर ऊपर वातावरण में पहुची. तो वंहा भी एक केमिकल रिएक्शन हुआ. जिससे ओजोन गैस बनी . जो सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों को, पृथ्वी पर आने से रोकने लगी. लगभग 15 करोड़ सालों तक ओजोन गैस की परत काफी मोटी हो गयी. जिससे पेड़ पौधे अस्तित्व में आये. और पृथ्वी पर ऑक्सीजन की मात्रा और ज्यादा बढ़ने लगी. इसके साथ पृथ्वी पर ज्यादा ऑक्सीजन होने से, समुद्री छोटे जीव जन्तुओं का विकास बहुत तेजी से होने लगा था. समुद्री जीव, बाहर निकल कर रेंगने लगे थे. और इनकी हड्डियाँ, मांसपेशियां बड़ी तेजी से बढ़ने लगी थी. जिससे कई तरह की अलग अलग प्रजातियों के जीव जन्तु पृथ्वी पर हो चुके थे.
 तभी आज से लगभग 2 सौ करोड़ साल पहले लारेशिया के मैदानों में अचानक ज्वालामुखी फटने लगे. और चारों तरफ लावा फैलने लगा. जिससे यंहा के सभी जीवों का अंत हो गया. जबकि गोंडवाना महाद्वीप में जैसे कुछ हुआ ही न हो. वंहा का तापमान लगभग 20 डिग्री सेल्सियस था. तभी वंहा पर आसमान से जलती हुयी राख गिरना शुरू हो गयी. जो की 16000 किलोमीटर दूर फट रहे ज्वालामुखी से निकली थी. उस ज्वालामुखी से सल्फर डाईऑक्साईड निकली, और वातावरण में मिलकर सल्फयूरिक एसिड बन गयी. जिसने वंहा भी सब कुछ जलाकर राख कर दिया. महासागर के पानी में मीथेन गैस के बुलबुले निकलने लगे थे. समुद्र और जमीन में कुछ था तो जला हुआ मलबा. पृथ्वी के 95% जीव जन्तु, पेड़ पौधे खत्म हो गये थे. लगभग 27 करोड़ साल पहले ज्वालामुखी के फटने से निकले लावा ने, दोनों महाद्वीपों को आपस में जोड़ दिया था. और 1 नया महाद्वीप बना दिया. जिसका नाम पेंजिया कहा गया.
जिसके बाद पृथ्वी डायनासौर , बड़े सांपो की प्रजातियाँ और बाद में हम इंसानों की अस्तित्व पृथ्वी पर आया.

Monday, 15 July 2019

चन्द्रमा कब और कैसे बना ,चाँद छोटा बड़ा क्यों होता है?

चन्द्रमा कब और कैसे बना ,चाँद छोटा बड़ा क्यों होता है?
आज से लगभग 4.5 अरब साल पहले जब संसार की संरचना में सूरज के पैदा होने के बाद सूरज की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण कई सारे छोटे बड़े गृह बन गये जिसमे 1 पृथ्वी भी थी. उस वक्त पृथ्वी का तापमान लगभग 1200 डिग्री सेल्सियस था. चारों तरफ जलता हुआ लावा था.

चाँद को हम मामा क्यों कहते है

 तब न जाने कंहा से थिया नाम का 1 उपग्रह जो साइज में मंगल गृह के बराबर था. जो की 1 लाख 80 हजार किमी प्रति घंटा की रफ्तार से पृथ्वी से जा टकराया और पृथ्वी में समाहित हो गया , यह टक्कर इतनी भयंकर थी की इस टक्कर से कई खरब टन मलबा पृथ्वी और थिया के बचे हुए  अवशेष पृथ्वी से निकल कर गुरुत्वाकर्षण बल के कारण पृथ्वी का चक्कर लगाने लगे और आपस में जुड़ कर 1 नया गृह बना जिसे आज हम चाँद कहते हैं. जैसे मानो की ये प्रकृति खुद को खुद से ही बना रही थी. थिया के पृथ्वी से टक्कर के कारण ही पृथ्वी अपने अक्ष से थोडा नीचे हुयी और घूमने की गति भी कम हुयी जिससे पृथ्वी पर जीवन संभव हुआ था.  

पृथ्वी से चाँद की दूरी कितनी है


यह चाँद उस वक्त पृथ्वी से मात्र 22000 किमी दूर था और पृथ्वी के निकले अवशेषों को इक्कट्ठा कर रहा था. जबकि जनवरी 2013 तक ये चाँद पृथ्वी से 4 लाख 964 किमी दूर है. आज चन्द्रमा को पृथ्वी का 1 चक्कर पूरा करने में 27 दिन 7 घंटे 43 मिनट लगते हैं . चाँद पृथ्वी का 1/4 हिस्से के बराबर है मतलब 1 पृथ्वी के अन्दर 4 चाँद समा जाएँ. आज तक मानव 6 बार चाँद पर जा चुका है. चाँद के द्वारा निकलने वाले गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी पर लगने की वजह से पृथ्वी पर तेज तूफान और समुद्र में ऊंची लहरें उठती थी.

चाँद पर दाग कैसे और क्यों दिखते हैं

 चाँद को अगर हम गौर से देखेंगे तो हमें मिलेगा की चाँद में 31% जगह काले धब्बों के हैं. जो आसमान से चाँद पर आई हुयी उल्का पिंड के गिरने से बने थे. चाँद के जिस स्थान पर ये उल्का पिंड गिरी वंहा  पर बड़े काले गड्ढे हो गये जो दूर से दाग धब्बे जैसे दिखते हैं.  बाकी का चाँद जले हुए राख के जैसे सफेद साफ दिखती है. चाँद जब बना तो वह 1 गर्म आग का गोला था फिर धीरे धीरे ठंडा हो गया. आज हमें चाँद से जो रोशनी मिलती है वो चाँद की नहीं बल्कि सूर्य की मिलने वाली रोशनी को रिफ्लेक्ट करता है. यही वजह है की चाँद 1 महीने के अन्दर कई अलग अलग आकृतियाँ बनाता है और कभी तो बिलकुल ही गायब हो जाता है. इसीलिए पृथ्वी को चाँद से मिलने वाली रोशनी काफी ठंडी और शीतल होती है. 

चाँद छोटा बड़ा क्यों होता है

पृथ्वी चन्द्रमा का 1 ही भाग देख पाती है ऐसा इसलिए है क्योंकि पृथ्वी अपनी धुरी पर चकरी के समान चारों तरफ घूमती है जबकि चाँद पृथ्वी के चारों तरफ लुढ़कती हुयी गेंद की तरह घूमती है जिससे चाँद का 1 भाग ही हमेशा पृथ्वी की तरफ रहता है.

CHANDRAMA KI UTTPATTI KAISI HUYI

Aaj se lagbhag 4.5 arab saal pahle jb Sansaar ki sanrachna me sooraj ke paida hone ke bad sooraj ki gurutwakarshan bal ke karan kai sare chhote bade grah ban gaye jisme 1 prithvi bhi thi. us wakt prithvi ka taapmaan lagbhag 1200 degree celsius tha. charon taraf jalta hua lawa tha tab na jane kanha se theia naam ka 1 upgrah jo size me mangal grah ke barabar tha  jo ki 1 lakh 80 hajar kmph ki raftaar se prithvi se ja takraya or prthivi me samahit ho gaya ,yah takkar itni bhayankar thi ki is takkar se kai kharb tan malba , prithvi or theia k bache huye avshesh prithvi se nikal kar gurutwakarshan bal ke karan prithvi ka chakkar lagane lage or apas me jud kr 1 naya grah bana diya jise aaj hm chand kahte hain. jaise mano ki ye prakriti khud ko khud se hi bana rahi thi , Theia ke prithvi se takkar ke karan hi prithvi apne aksh se thoda neeche jhuk gyi or ghoomne ki gati kam ho gyi jisse prithvi pr jeewan sambhav hua tha.

yah chand us wakt prithvi se matra 22000 km door tha or prithvi ke nikle avsheshon ko ikkattha kar raha tha. jabki january 2013 tak ye chand prithvi se 4 lakh 964 km door hai. aaj Chandrama ko prithvi ka 1 chakkar poora karne me 27 din 7 ghante 43 minute lagte hain. Chandrama prithvi ka ¼ hisse ke barabar hai matlab 1 prithvi ke andar 4 chand sama jayen . aaj tak manav 6 bar chand par ja chuka hai. chand k dwara nikalne wale gurutwakarshan bal prithvi pr lagne ki wajah se prithvi pr tez tufan or samudra me behad oonchi lahre uthti hain. chandrama ko agar ham gaur se dekhenge to hame milega ki chand me 31% jagah kale dhabbon ke hain. jo asmaan se chand pr aayi huyi ulka pind ke girne se bane the. chand ke jis sthan pr ye ulka pind giri wanha pr kala dhabba ho gya baki ka chandrama jale huye raakh ke jaise safed or saaf dikhti hai. chand jb bana to wah 1 garm aag ka gola tha fir dheere dheere thanda ho gya. aaj hame chandrama se jo roshni milti hai wah chand ki khud ki nahi hai balki wah soorya se milne wali roshni ko reflect karta hai. Yahi wajah hai ki chandrama 1 mahine ke andar kai tarah ki alag alag aakritiyan banata hai or kabhi kabhi to gayab bhi ho leta hai. Prithvi ko chand se milne wali roshni behad thandi or sheetal hoti hai.
Prithvi chandrama ka 1 hi bhag dekh pati hai aisa isliye hai kyuki prithvi apni dhuri pr chakri ki tarah charon taraf ghoomti hai jabki chandrama prithvi ke charon or ludhakti huyi gend ke jaise ghoomti hai jisse hame chandrama ka sirf 1 taraf ka hissa hi dikhai deta hai.
                                                                    


सूरज का अंत कैसे होगा, कब तक सूरज जलता रहेगा.

सूरज का अंत कैसे होगा, कब तक सूरज जलता रहेगा :-

हम सब को ये पता है की सूरज एक आग का गोला है जो पिछले 5 अरब साल से लगातार जल रहा है. सूर्य हर 1 सेकंड में 6 हजार 570 लाख टन हाइड्रोजन को जलाकर 6 हजार 530 लाख टन हीलियम में बदल रहा है. इन आंकड़ों को देखें तो पता चलेगा की इस क्रिया में 40 लाख टन हाइड्रोजन हीलियम में बदली ही नहीं बल्कि ताप , उर्जा बन कर पूरे ब्रम्हांड में फैल जाती है. ऐसे सूर्य हर 1 सेकंड अपना लाखों टन ताप ब्रम्हांड में घुमा रहा है. लेकिन ऐसा तब तक ही चलेगा जब तक सूरज के अन्दर हाइड्रोजन मौजूद है,

सूरज लगातार कैसे जलता रहता है

 सूर्य के अन्दर हाइड्रोजन की मात्रा अभी 50% बची है जिससे सूर्य आने वाले 5 अरब सालों तक ऐसे ही जलता रहेगा और हम सब को अपना प्रकाश देगा. लेकिन जब सूर्य के केंद्र का हाइड्रोजन खत्म हो जायेगा तब सूर्य में हीलियम गैसे ज्यादा हो जाने से सूर्य का केंद्र का तापमान हद्द से ज्यादा हो जायेगा जिसकी वजह से सूरज फूल कर बड़ा होने लगेगा. अभी सूर्य जितना बड़ा है फूलने के बाद उसका 100 गुना ज्यादा बढ़ने लगेगा जिससे सूर्य के पास के सभी ग्रहों को सूर्य अपने अन्दर समा लेगा. बुद्ध और शुक्र सबसे पहले सूर्य के अन्दर समाहित हो जायेंगे उसके बाद आएगी पृथ्वी की बारी. तब तक पृथ्वी से इन्सान , जीव - जंतु , पेड़ - पौधों का अस्तित्व खत्म हो चुका होगा और करोड़ो साल के बाद सूर्य में अब सिर्फ हीलियम ही बचा होगा जिससे हीलियम अब कार्बन में बदलने लगेगा. जिससे सूर्य की ऊपरी सतह शख्त हो कर टूट कर अन्तरिक्ष में बिखर जाएगी.

सूरज का अंत हो कर ब्लैक होल बन जायेगा

 आखिर में सूर्य का आंतरिक भाग ही बचेगा जो की पृथ्वी के जितना बड़ा होगा जो धीरे धीरे बुझ कर 1 ब्लैक होल (राख) बन जायेगा . इस तरह हमारे सूर्य का अंत होगा. शुक्र है की ये सब होने में अभी 5 अरब साल लगेंगे जो बहुत ही ज्यादा होता है. ब्रमांड में ऐसे कई तारे गृह सूर्य के पहले नष्ट हो चुके है और अभी भी नए गृह तारे बन रहे है ऐसे ही हमारे इस ब्रम्हाण्ड में सर्जन की फिर विनाश और फिर से सर्जन की ये क्रिया ऐसे ही चलती रहेगी.


Sooraj ka ant kaise hoga? kab tak sooraj aise hi jalta rahega?

Sooraj ek aag ka gola hai jo har 1 second me 6 hajar 570 lakh tan hydrogen ko jalakar 6 hajar 530 lakh tan helium me badal deta hai. Ab 40 lakh tan hydrogen helium me badalti hi nahi balki urja bankar poore bramhaand me fail jati hai. Aise soorya har second apna taap antriksh me ghuma raha hai. Lekin aisa tab tak hi chalega jb tak sooraj ke andar hydrogen maujood hai. Soorya ke andar Hydrogen ki matra abhi 50%  bachi hai, jisse sooraj 5 arab saal baad tak aise hi jalta rahega . Uske bad soorya ke kendra ka hydrogen khatam ho jayega. Soorya me sirf helium hone ke karan soorya ke kendra ka taapmaan hadd se jyada garm ho jayega, jiski wajah se sooraj fool kr badhne lagega. Soorya jitna bada abhi hai usse 100 guna jyada badh jayega Or badhte badhte wo sare grah ko apne andar sama lega buddh , shukra, sabse pahle hi sooraj ke andar chale jayenge. Uske bad ayegi pritvi ki bari. Lekin tab tak prithvi se insan , ped paudho ka astitva khatam ho chuka hoga. Or croro saal ke bad soorya me ab sirf helium hi bacha hoga jisse helium ab carbann me badalne lagega jisse soorya foolkr badhta rahega. Aisa hone se sooraj ki upri satah shakt ho kr toot kr antriksh me bikhar jayegi, akhir me soorya ka aantrik bhag hi bachega, wah bhag us samay lagbhag aaj ki prithvi ke barabar hoga. Fir bhi usme taap bahut hoga jo dheere 2 bujh kr 1 black hol (koyala) ban jayega. Is tarah hamare soorya ka ant hoga. Shukra hai ye sb hone me abhi 5 arab saal lagenge. Bramhaand me aise kai taare grah soorya ke pahle nasht ho chuke hain. Or abhi bhi naye grah tare ban rahe hai. Aise hi hamare bramhaand me sarjan ki vinash ki or fir punah sarjan ki ye kriya chalti rahegi. 

सूरज का जन्म कैसे हुआ , सूर्य कैसे जलता रहता है.

सूरज का जन्म कैसे हुआ :-
 आज से लगभग 5 अरब साल पहले अन्तरिक्ष के आकाशगंगा में कई गैसों के मिश्रण से एक बहुत जोरदार धमाका हुआ , इस धमाके से 1 बहुत बड़ा आग का गोला बना जिसे हम आज सूरज कहते हैं. सूरज की उमर लगभग 10 अरब साल है. वैज्ञानिको के अनुसार सूरज को जलाये रखने वाली गैस पिछले 5 अरब सालों में अभी सिर्फ 50 % ही जली है बाकि गैसें सूरज को अभी अगले 5 अरब सालों तक और जलाये रखेगी जिससे सूरज हमें रोशनी देता रहेगा.

सूरज एक तारा है

सूर्य हमारे सौर मंडल के केंद्र में स्थित एक सबसे बड़ा तारा है. जिसके चारों तरफ गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सभी गृह और उपग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं. ठीक वैसे ही सूर्य भी पूरे सौर मंडल को साथ में लेकर आकाशगंगा के मध्य भाग की परिक्रमा कर रहा है. सौर मंडल के सभी गृहों को आकाशगंगा की एक परिक्रमा पूरी करने में 25 करोड़ साल लग जाते हैं. सूरज का व्यास लगभग 14 लाख किमी है. जो पृथ्वी का 109 गुना अधिक है.

सूरज का तापमान और सूरज की रोशनी के बारे में.

पृथ्वी से सूरज देखने में ज्यादा बड़ा नहीं दिखता क्योंकि सूर्य पृथ्वी से लगभग 15 करोड़  किमी दूर है. सूर्य के पृथ्वी से इतना अधिक दूरी होने के बाद भी सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर मात्र 8 मिनट 16 सेकंड में आ जाती है. सूर्य का साइज़ इतना ज्यादा बड़ा है की 1 सूर्य के अन्दर 13 लाख पृथ्वी समा सकती हैं . धरती की तरह सूर्य की सतह कठोर नहीं है सूर्य में तमाम गैसों से बनी आग और मलबा है. जिसमे हाइड्रोजन 74 % , हीलियम 24% , और बाकि 2% में लोहा , निकिल , ऑक्सीजन , सिलिकॉन , सल्फर , मैग्निसियम , कार्बन , नियान , कैल्सिअम, क्रोमिअम जैसे तत्व हैं.  सूर्य के केंद्र को कोर कहा जाता है, जिसका तापमान 1 करोड़ 56 लाख डिग्री सेल्सियस है. जबकि सूर्य की ऊपरी सतह पर हमेशा जलती हुयी आग का तापमान लगभग 6 हजार डिग्री सेल्सियस तक रहता है. सूर्य का गुरुर्त्वाकर्षण बल धरती से 28 गुना ज्यादा है. मतलब अगर किसीका वजन धरती पर 50 किग्रा है तो सूर्य पर उसका वजन 1400 किग्रा होगा. सूर्य की रोशनी का हमारे जीवन में बहुत बड़ा महत्व है. इसके कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव हो सका है अगर सूरज की रोशनी पृथ्वी पर कुछ समय के लिए न पड़े तो कुछ दिनों में पृथ्वी बर्फ के गोले के समान बन जाएगी.


Sooraj kaise bana in hinglish

 Aaj se lagbhag 5 arab varsh pahle antriksh me kai gaison ke mishran se 1 bahut zordar dhamaka hua  is dhamake se 1 bahut bada aag ka gola bana jise ham sooraj kahte hain. sooraj ki umar lagbhag 10 arab saal hai. Vaigyaniko ke anusar sooraj ko jalaye rakhne wali gais pichle 5 arab salon me abhi sirf 50% hi jali hai baki gaisen sooraj ko agle 5 arab saal tak or jalaye rakkhegi . Jisse sooraj hame roshni deta rahega. soorya hamare saur mandal ke kendra me sthit 1 tara hai jiske charon or prithvi, chandrama sahit saur mandal ke anya grah chakkar lagate hain. Jis tarah prithvi or anya grah soorya ki parikrama karte hain vaise hi soorya bhi poore saur mandal ko sath me laker aakashganga ke madhya bhag ki parikrama kar rha hai. Saur mandal ke sabhi grah ko akashganga ki 1 parikrama poori karne me 25 crore saal lg jate hain . Sooraj ka vyas lagbhag 14 lakh km hai. jo prithvi ka 109 guna adhik bada hai. Prithvi se sooraj dekhne me jyada bada nahi dikhta kyuki sooraj prithvi se lagbhag 15 crore km door hai. Sooraj prithvi se itna door hone ke bavjood bhi soorya ki roshni prithvi pr matra 8 minute 16 second me aa jati hai. Sooraj itna bada hai ki 1 soorya ke andar 13 lakh prithvi sama sakti hain. Dharti ki tarah soorya ki satah thos nahi hai. soorya me gaison se bani aag or malba hai. Jisme hydrogen 74% helium 24% or baki 2% me loha , nikil , o2 , silicon , sulphur, magnicium, carbann , neon , calcium , chromimum jaise tatv hai. Soorya ke andar ke kendra ko core kaha jata hai . Jiska temparature 1 crore 56 lakh degree Celsius hota hai. Jabki soorya ki satah par hamesha jalne wali aag ka temparature lagbhag 6000 degree Celsius tak rahta hai. Soorya ka gurutvakarshan bal dharti se 28 guna jyada hai matlb agar kisika vajan dharti pr 50 kg hai to soorya pr uska vajan 1400 kg hoga. Soorya ki roshni ka hamare jeewan me bahut bada mahatva hai iske karan hi prithvi pr jeewan sanbhav ho saka hai agar sooraj ki roshni prithivi par na pade to kuch hi samaye me dharti barf ka gola ban jayegi.